…”अगर मैं दरवाज़ा खुला छोड़ दूं तो बकरियां अंदर आ जाएंगी और सारी पेंटिंग खा लेंगी, उन्हें काग़ज़ खाना बहुत पसंद है, मुझे लगता है कि पिछले 10 सालों में बकरियां लगभग मेरी सभी पेंटिंग्स में हैं” ये कहना है देश की मशहूर पेंटर अंजोली इला मेनन का जो पिछले कई दशकों से इस शहर को सिर्फ़ बाहर से नहीं, बल्कि उसके भीतर रहकर देखती, महसूस करती और अपने कैनवास पर उतारती आई हैं। ये बात वे अपने स्टूडियो के बारे में कह रही हैं जो कि निज़ामुद्दीन में स्थित है।(हाल ही में दिए एक इंटरव्यू का हिस्सा)
हालांकि इससे पहले भी वे निज़ामुद्दीन में अपने स्टूडियो के बारे में बता चुकी हैं कि उन्हें यहां हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के साए में काम करना पसंद है। बेशक, ये दरगाह शहर की सदियों पुरानी तारीख़ की मुसलसल चली आ रही कड़ी का हिस्सा है।
चंद क़दमों के फासले में तस्वीर बदल गई
पिछले दिनों हमारा भी निज़ामुद्दीन दरगाह पर जाना हुआ चूंकि दिन गुरुवार था तो यहां अच्छी-ख़ासी भीड़ थी, वो भी इतनी कि लोग एक-दूसरे से टकराते हुए आगे बढ़ रहे थे, दरगाह के बाद हम ज़रा आगे बढ़े, जैसे-जैसे ये गलियां आगे बढ़ रही थीं और तंग होती चली गईं, कुछ तो ऐसी थीं कि जिनमें दो लोगों का एक साथ निकलना मुश्किल लग रहा था। इन्हीं गलियों से गुज़रते हुए महसूस हुआ कि शोर में एक तब्दीली आ गई है। भीड़ की आवाज़ पीछे छूट गई और उसकी जगह परिंदों की धीमी चहचहाहट ने ले ली। अचानक से कुछ बड़े-बड़े दरख़्त नज़र आने लगे, यक़ीन करना मुश्किल हो रहा था कि चंद क़दमों के फासले में आस-पास का पूरा माहौल इतना कैसे बदल गया। ये निज़ामुद्दीन बस्ती थी और सामने तुगलक काल की एक मस्जिद खड़ी थी, भारी पत्थरों वाली ख़ूबसूरत मस्जिद जिसका नाम कलां (काली) मस्जिद है।

रोज़मर्रा की ज़िन्दगी, कैनवास का सब्जेक्ट
क्या इसी माहौल ने पेंटर मेनन को दशकों से यहां बांधे रखा है। यहां का जीवन उनकी पेंटिंग्स में ज़िदा हो उठता है, निज़ामुद्दीन बस्ती के लोग ही नहीं यहां की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी उनके कैनवास का सब्जेक्ट बन गए। जो 2014 में ‘निज़ामुद्दीन बस्ती’ नाम से बनाई गई उनकी पेंटिग्स में भी दिखती है। चित्र में मां अपने बच्चे और बकरियों के साथ एक छोटी सी दुनिया में ग़ुम नज़र आती है। इस आम सी बस्ती के सादा से जीवन में जो आकर्षण है उसे इस कलाकार ने बख़ूबी पकड़ा, यहां का सुकून और अपनापन उनकी तस्वीरों में झलकता है। किसी तस्वीर में झरोखा नुमा दर या फिर खिड़की के बाहर दिखती बकरी यहां के जीवन की छाप उनकी तस्वीरों में बसी हुई नज़र आती है।
मोरों के साथ भोर और मस्जिद मोठ गांव
दरअसल, ये चर्चा यहां इसलिए की जा रही है क्योंकि पिछले दिनों कुछ ऐसे लोगों से बातचीत और मुलाक़ात हुई जो दिल्ली की मूल पहचान के लिए काम कर रहे हैं। उनके इस काम ने मेरे दिल्ली को देखने के नज़रिए में भी तब्दीली पैदा कर दी हालांकि मैं ख़ुद एक ऐसी जगह पैदा हुई जो साउथ दिल्ली के कई गांवों से घिरा था, हमारी कॉलोनी से लगी जैन दादा बाड़ी और उससे लगा गांव मस्जिद मोठ। हमारी सुबह अक्सर छत पर सो कर उठने पर मोरो के आस-पास घूमते हुए देखने से होती थी। शायद कुछ लोग जानते हों जिस वक़्त भारत में टीवी शो एक नई शक्ल ले रहे थे उस वक़्त कई प्रोडक्शन हाउस इस गांव में खुले थे अगर मेरी जानकारी सही है तो देश के पहले क्राइम शो ‘इडियाज़ मोस्ट वांटेड’ का भी एक ऑफिस यहां था। हम अक्सर टीवी से जुड़े लोगों को हमारी लोकल मार्केट ‘लीला राम’ में पैदल ही घूमते हुए देखते थे।
शाहपुर जट और अब्दुल कलाम
वहीं दूसरी तरफ शाहपुर जट (जिसे आजकल कुछ लोग शाहपुर जाट बुला रहे हैं) गांव भी था, जिसका एक हिस्सा एशियाड विलेज बन चुका था और यहां हमारी कॉलेज की एक दोस्त रहती थी तो अक्सर आना-जाना लगा रहता था। उसने बताया कि पास ही कोई बड़े वैज्ञानिक रहते हैं जिनकी वजह से सिक्योरिटी बहुत ज़्यादा कर दी गई है, ये वही वैज्ञानिक थे जो आगे चलकर देश के राष्ट्रपति बने, एपीजे अब्दुल कलाम, उनके अलावा पेंटर जतिन दास ( नदिता दास के पिता) भी यहीं रहते थे। वहीं बचपन में स्कूल टाइम की बहुत सी दोस्त ऐसी थीं जिनके घर कोटला मुबारकपुर में थे। तो हम वहां भी आते-जाते रहते थे। वहां हमने लाइन से बंधी भैंसों की देखभाल करती चटख रंगों वाली चुनरी ओढ़े बुजुर्ग महिलाओं को देखा था।
कहां गया किदवई नगर का दशहरा ग्राउंड?
वहीं गर्मियों की छुट्टियों में अगर हम अपने गांव ना जा पाते तो दोस्तों की टोली संग आस-पास के इलाक़ों को पैदल ही नाप डालते, कभी सिरी तक पैदल चले जाते तो कभी गुलमोहर पार्क में अमिताभ बच्चन की कोठी (उनके पिता की कोठी) को तलाशना शुरू कर देते। हौज़ख़ास भी ज़्यादा दूर नहीं था। आज पलट कर देखती हूं कि जिस जगह दिल्ली का पहला मॉल अंसल प्लाज़ा खड़ा है वहां मुझे खेत और कीकर के पेड़ों का जंगल नज़र आता है, हालांकि ये यादें बहुत धुंधली हैं। इन धुंधली यादों में जिन जगहों पर आज फ्लाइओवर हैं वहां कभी कतार से लगे बूढ़े पेड़ थे, हम अपने घर से एम्स या सफ़दरजंग हॉस्पिटल की तरफ जाते तो सड़क के दोनों तरफ घने पड़ों का सायबान तना रहता था। आज जहां एम्स का फ्लाइओवर और ऊंची इमारत बन गई हैं वहां कभी धूल भला किदवई नगर का बहुत बड़ा ग्राउंड था जिसमें हम दशहरा पर जलते हुए रावण को देखने जाते थे। पर अब वो वहां नहीं है!
इब्न-ए-बतूता और निज़ामुद्दीन बस्ती
बहरहाल, लौटते हैं निज़ामुद्दीन बस्ती पर, जो हमें मध्यकालीन दिल्ली की दहलीज़ तक ले जाती है। जिसकी कई निशानियां हमें आज भी इस बस्ती में बिखरी मिलती हैं, दरअसल जिस जगह को सूफ़ी हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के नाम पर आज निज़ामुद्दीन बस्ती के तौर पर जाना जाता है, कभी वो ग्यासुद्दीन बलबन के नाम पर ग्यासपुर के नाम से भी जानी जाती थी। उस दौर की चंद निशानियां आज भी यहां मौजूद है, जिनमें लाल महल या कुशक-ए-लाल भी है। 14 वीं सदी के घुमक्कड़ इब्न-ए-बतूता ने अपने लेखन में एक लाल महल का ज़िक्र किया है। माना जाता है वो निज़ामुद्दीन स्थित लाल महल का ही ज़िक्र कर रहे थे। हालांकि जब मैंने उसे देखने की कोशिश की तो वहां, महल नाम की कोई शह ना थी, बस एक दीवार की झलक देखने को मिली।

चूंकि यहां हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह है इसलिए यहां कई ख़ास लोगों ने ज़िदा रहते ही अपनी आख़िरी आरामगाह का इंतज़ाम कर लिया था। जिसकी वजह से यहां इतिहास के पन्नों के कई अहम किरदार मिलते हैं।

हैरिटेज वॉक डेस्टिनेशन
इनके अलावा यहां ख़बूसूरत टाइलों से सजा अतगा ख़ान का मकबरा किसी भी कला प्रेमी या फिर फोटोग्राफी में दिलचस्पी रखने वाले के लिए एक परफेक्ट डेस्टिनेशन है। वहीं वास्तुकला के ऐतबार से फ़िरोज़ शाह तुगलक के प्रमुख वज़ीर ख़ान-ए-जहां तेलंगानी का अष्टकोणीय योजना पर आधारित मकबरा भी बेहद ख़ास है। इन सब के अलावा यहां मेहराबदार सौ-सवा सौ साल पुरानी हवेलियां भी कला प्रेमियों को अपनी तरफ ख़ींचती हैं।

हालांकि पुरानी बस्ती ने अपना रूप बदल लिया है, कभी यमुना के क़रीब घना जंगल रही ये जगह आज दिल्ली के घने बसे इलाकों में से एक है, लेकिन बावजूद आर्ट की नज़र से देखा जाए तो यहां बहुत कुछ ऐसा बिखरा पड़ा है जो अपनी तरफ खींचता है। फिर वो डायरेक्टर इम्तियाज़ अली हो जो सूफ़ी माहौल के लिए यहां खींचे चले आए या फिर वो तमाम स्टिल लाइफ फोटोग्राफर या पेंटर जिन्हें यहां अक्सर आना पसंद है। और आज की तारीख़ में तो हैरिटेज वॉक करवाने वालों के लिए भी ये एक परफेक्ट डेस्टिनेशन बन चुका है। और शायद यही वजह है कि सालों से पेंटर अंजोली इला मेनन भी इसी माहौल में ख़ुद को सबसे ज़्यादा क्रिएटिव पाती होंगी।

चूंकि गुज़िशता दिनों में दिल्ली को देखने के नज़रिए में बदलाव आया तो जिस वक़्त मैं निज़ामुद्दीन बस्ती को एक लिविंग आर्ट गैलरी के तौर पर देख रही थी ठीक उसी वक़्त आंखों के सामने साउथ दिल्ली के ही कालका गढ़ी गांव की दहलीज़ पर बना एक बेहद ख़ूबसूरत चौपाल का गेटवे याद आ रहा था।
कालका गढ़ी गांव
कुछ साल पहले इस चौपाल के बारे में मुझे तब पता चला था जब एक बारिश के सीज़न में इसके गेट के आगे का कुछ हिस्सा गिर पड़ा था, मैं तभी से यहां जाने के बारे में सोच रही थी लेकिन इंस्टाग्राम की एक तस्वीर ने आख़िरकार मुझे यहां पहुंचा ही दिया। क्या ख़ूबसूरत जगह, मेहराब और झरोखों वाला गेट, दीवारों से जगह-जगह प्लास्टर झड़ चुका था जिनमें से झांकती लाखौरी ईंटे गुज़रे वक़्त की तस्दीक कर रही थीं, गेट की दीवार पर आज भी कुछ रंग दिखाई देते हैं लेकिन वो कितने पुराने हैं ये बताना मुश्किल है।
हालांकि इसके बारे ज़्यादा जानकारी तो नहीं मिली (दस्तावेज के तौर पर) लेकिन पुरानी मीडिया रिपोर्ट खंगालने पर पता चला कि स्थानीय लोगों का मानना है कि ये ख़ूबसूरत प्रवेशद्वार और उससे सटी हुई मेहराबदार बरामदे वाली संरचना उस परिवार ने बनवाई थी जिसने गढ़ी गांव की स्थापना की थी यह परिवार दो भाइयों झरिया और मारिया का था।
वैसे वास्तुकला के मुरीद इसे घंटों निहार सकते हैं। गेट से अंदर दाख़िल होते ही यहां हर तरफ आर्ट पीस बिखरे पड़े मिले, पता चला कि ये ललित कला अकादमी का रीज़नल सेंटर हैं (गढ़ी) । जिसकी वजह से यहां कलाकारों को काम करते देखना, आर्ट पीस को गढ़ते, उन्हें पेंट कर के सूखते हुए निहारना एक अलग अनुभव करवा रहा था। गार्ड ने बताया कि यहां डीडीए का पार्क भी है जो आम लोगों के लिए खुला रहता है, ऐसे में जब मैंने वहां बच्चों को क्रिकेट खेलते देखा तो यहां-वहां बिखरे पड़े आर्ट की चिंता सताने लगी।
कुछ और आगे बढ़ी तो हैरान रह गई यहां एक चौपाल बनी थी जो फिलहाल लाखौरी ईंटों का ढांचा भर है, और कभी भी ख़त्म हो सकती है, यहां एक बोर्ड लगा था जिसपर दर्ज था ”प्राचीन चौपाल, गांव कालका गढ़ी, संस्थापक चौधरी गुलाब सिंह गुर्जर, स्थापना दिवस: 17 अप्रैल 1742” एक मीडिया रिपोर्ट में हैरिटेज एक्टिविस्ट विक्रमजीत सिंह का एक बयान मिला जिसमें वे कहते हैं कि ”18वीं सदी के किसी भी प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ में इसका उल्लेख नहीं मिलता। हालांकि इसकी वास्तुकला मुग़लकालीन है और यह कालका गढ़ी से क़रीब एक किलोमीटर दूर है, जहां तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के अशोक के शिलालेख मिले हैं” इसके साथ ही वे कहते हैं कि ” इस स्मारक पर देवनागरी और नस्ख़ लिपि, दोनों में लेख मिले हैं। हमें ऐसी संरचनाओं को संरक्षित रखना चाहिए, क्योंकि ये सांप्रदायिक सौहार्द के इतिहास के प्रमाण है”
बेशक, ये विरासत किसी की भी रही हो, लेकिन मौजूदा दौर में एक क़ीमती धरोहर है। मेरे लिए ये देखना बहुत ख़ूबसूरत एहसास था जहां एक तरफ चौपाल पर बैठकी लगती हो और दूसरी तरफ कलाकार एक पत्थर को आर्ट पीस में तब्दील कर रहा हो और वो भी घने पेड़ों के साए में आस-पास चिड़ियों, गिलहरियों, घूमती बिल्लियों के बीच।

गांव बन गया ‘विलेज’
दिल्ली में गांव हैं ये हम बचपन से जानते थे, लेकिन तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण ने उन्हें गुम कर दिया, चूंकि मैं साउथ दिल्ली में ही पली-बढ़ी हूं तो मैंने अपनी नज़रों से इसे बदलते देखा है, हौज़ ख़ास विलेज फैशन हब था जो अब शाहपुर जट (जाट) में शिफ्ट हो गया। आज भी हौज़ ख़ास में फैशन बुटिक हैं लेकिन क्लब और कैफे तेज़ी से बढ़ चुके हैं। यहां कभी फिरोज़शाह तुगलक के दौर में वर्ल्ड क्लास मदरसा था, हौज़ जिसका मतलब ही तालाब होता है वो आज भी यहां मौजूद है और उसी के नाम पर इस गांव का नाम हौज़ ख़ास पड़ा होगा (शायद)। हो सकता है पीछे जाने पर इसके इतिहास में कुछ और पन्ने जुड़े जिन्हें बेशक तलाश करने की ज़रूरत है।
लेकिन मेरी तलाश ने मुझे दिल्ली के गांव में आर्ट कनेक्शन तलाश करने में मदद की, जो आगे भी जारी रहने वाली है…
(नाज़मा ख़ान की रिपोर्ट।)